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गुरूकुलों में शास्त्रीय शिक्षा पद्धति से छात्र का सर्वांगीण विकास

गुरूकुल शिक्षा के पांच संकाय पर परिचर्चा संपन्न
ज्ञान निधि से लेकर योग,विज्ञान पर हुई परिचर्चा
परिचर्चा में देश विदेश के गुरुकुल हुए शामिल
उज्जैन. राष्ट्रीय विराट गुरूकुल सम्मेलन के दूसरे दिन प्रात: गुरूकुल शिक्षा के पांच अलग-अलग विषयों पर विषय के विषेशज्ञों द्वारा विषयों पर रुचि रखने वाले के साथ परिचर्चाएं की गई।  गुरूकुल की शास्त्रीय शिक्षा पद्धति पुन: मुख्यधारा की शिक्षा बनने की ओर अग्रसर होगी। कार्यक्रम स्थल पर गुरूकुल शिक्षा के पांच संकाय क्रमश: पाठशाला (ज्ञान निधि), नाट्यशाला (कला), गौशाला (कृषि), वेधशाला (योग), प्रयोगशाला (विज्ञान) बनाए गये हैं। इन पांचों संकायों में विषयों के विशेषज्ञों द्वारा रुचि रखने वाले सुधीजनों के साथ चर्चाएं की गईं और विषयों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियों दी गईं। जिसके कारण यहां का विद्यार्थी  सर्वांगीण विकास की ओर अग्रसर होता है। 
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पांचों संकायों में परिचर्चा सुनने के बाद चर्चा में सारांश यह निकला कि भारत की महान ऋषि परंपराओं से संबद्ध उन समस्त गुरूकुलों और उनके गुरूओं-आचार्यों ने भारतीय ज्ञान-विज्ञान, कला, कृषि, योग आदि की पारंपरिक मशाल को बुझने नहीं दिया है। इंसान के जीवन में इन संकायों की विधाओं का ज्ञान होना चाहिए। भारतीय जीवन दर्शन का मूल आत्मिक चिन्तन, आत्मा की अमरता-दिव्यता तथा जीवन सत्य पर आधारित होना चाहिए।  
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प्रयोगशाला में विज्ञान के वक्ता श्री तेजस्व कुलकर्णी, श्री रतन वशिष्ट, श्री कपिलदेव मिश्रा तथा श्री अनिल, नाट्यशाला में कला के वक्ताओं में डॉ. सच्चिदानंद जोशी  अमीरचंद, आचार्य वासुदेव कृष्ण शात्रि नेपाल, आचार्य च. मू. कृष्णाशास्त्री , गौशाला, कृषि में वक्ता  दिनेश मरोठिया,  आर पी तिवारी,  टी.वी कट्टीमनी,  गिरीश प्रभुणे, वेधशाला योग के वक्ता श्री अनिरूद्ध देशपाण्डे, डॉ. प्रतिमा जोशी, डॉ. मोहन लाल छिपा, आचार्य वेदनिष्ठ, पाठशाला ज्ञान निधि के वक्ता आचार्य हरिप्रसाद अधिकारी, डॉ. हेमचंद्र तथा आचार्य नीलकंठन ने अपने-अपने विषय से संबंधित विविध प्रकार की महत्वपूर्ण जानकारियों से सुधिजनों को अवगत कराया।
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चर्चा के दौरान विषयों के विशेषज्ञों ने सुधिजनों की जिज्ञासाओं का समाधान किया और उनके सुझाव पर अमल लाने हेतु कार्यवाही करने हेतु आश्वस्त किया। उक्त विधाओं में व्यक्तियों को पारंगत होना चाहिए ताकि भारतीय पंरपरा और गुरूकुलों में दिये जाने वाले ज्ञान को अमल में लाकर जीवन को सार्थक किया जा सके।  


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