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कुचिपुड़ी समूह नृत्य से सराबोर होता उत्तराधिकार का मंच

राग मारू विहाग से हुई उपशास्त्रीय गायन की शुरुआत
वन्देहम से हुई कुचिपुड़ी समूह नृत्य की शुरुआत
नृत्य नाटिका की परम्परा है कुचिपुड़ी नृत्य
भोपाल. मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में परम्परा, नवप्रयोगों एवं नवांकुरों के लिए स्थापित श्रृंखला उत्तराधिकार  में आज उपशास्त्रीय गायन एवं कुचिपुड़ी समूह नृत्य की प्रस्तुतियाँ संग्रहालय सभागार में हुईं। पहली प्रस्तुति में पंडित सिद्धराम स्वामी कोर्वर जी की शिष्या डॉ. दिव्यता गर्ग ने अपने साथी कलाकारों के साथ बउपशास्त्रीय गायन की शुरुआत राग मारू विहाग विलंबित एक ताल में रसिया न जा से प्रारंभ करते हुए छोटा ख्याल तीन ताल में लागी रे लगन पिया और दादरा ताल में जिया मोरा न लागे प्रस्तुत किया। दिव्यता गर्ग का साथ तबले पर अरेस उपध्याय ने, हारमोनियम पर डॉ. अमिता गर्ग ने, बाँसुरी पर सुमीत कोल्हे ने, तानपुरे पर ज्योति वाग ने और कोरस पर पल्लवी भंडारे और तानिया ने साथ दिया। संगतकारों ने सधी हुई सगंत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
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दूसरी प्रस्तुति में मंजू भार्गवी की शिष्या दीपानारायणन सशिन्द्रन ने अपने साथी कलाकारों के साथ कुचिपुड़ी समूह नृत्य की शुरुआत वन्देहम से की, जिसमें वेंकटेश्वर भगवान को सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ और सर्व-भूत माना गया।
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दीपानारायणन का साथ उमा प्रणेश, रक्तिमा चन्दा और देव कुमार ने दिया। वन्देहम के पश्चात् क्रमशः प्रवेश द्वारुव, कीर्थनम जिसमे में वेंकटेश्वर भगवान विविध रूपों का बखान किया गया, तरंगम जो कृष्ण लीला और कृष्ण से संबंधित है पर दीपानारायणन ने नृत्य प्रस्तुत किया और अंत में तिल्हण जिसमें माँ दुर्गा और शक्ति के रूपों का बखान किया गया है पर कुचिपुड़ी नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
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दीपानारायणन सशिन्द्रन का साथ नृत्य में रक्तिमा चन्दा, देव कुमार, उमा प्रणेश आरती नीर और श्रीदेवी शिने ने दिया। भारतीय नृत्य शैलियों में कुचिपुड़ी नृत्य प्राचीन नृत्य शैलियों में से एक है। यह नृत्य विधा मूलतः आंध्रप्रदेश की है। इस नृत्य को नृत्य नाटिका परम्परा से भी प्रेरित मानते हैं।
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दीपानारायणन सशिन्द्रन ने नृत्य की शिक्षा मंजू भार्गवी से प्राप्त की। दीपानारायणन सशिन्द्रन कुचिपुड़ी परंपरा फाउंडेशन, बैंगलोर की संस्थापक सदस्य हैं। इन्होंने 8 वर्ष की आयु से ही कुचिपुड़ी नृत्य की प्रारंभिक शिक्षा लेना प्रारंभ कर दिया था।
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इन्होंने देश ही नहीं विदेशों के भी कई कला मंचों पर कुचिपुड़ी नृत्य की प्रस्तुतियाँ दी हैं। जिनमें उतरी अमरीका, दुबई, बहरीन आदि प्रमुख हैं। प्रस्तुतियों के दौरान दर्शकों ने कलाकारों का करतल ध्वनि से उत्त्साह वर्धन किया।

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