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यशोधरा में व्याख्यान एवं नाटक बुद्धायन का मंचन हुआ

स्वर्ण हंस जातक पर आधारित रहा नाटक
ढाई हजार साल पहले लिखी गईं है कथाएं
कथाओं का एक एक दृश्य हुआ साकार
भोपाल. मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में बुद्धत्व की कथाओं के रंग महोत्सव पर केन्द्रित यशोधरा में आज जातक कथाओं की प्रासंगिकता पर व्याख्यान संग्रहालय सभागार में हुआ एवं स्वर्ण हंस जातक पर आधारित नाटक बुद्धायन का मंचन संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच पर हुआ।
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कार्यक्रम की शुरुआत संजय उपाध्याय ने सत्यदेव त्रिपाठी का परिचय देते हुए की। सत्यदेव त्रिपाठी ने अपने वक्तव्य में जातक कथाओं की प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की। सत्यदेव त्रिपाठी ने बताया की जातक कथाएँ असल में दो से ढाई हजार साल पहले लिखी गईं। 

उन्होंने बताया जातक कथाएँ हमें आदर्श देती हैं और सिर्फ मनुष्यों या अवतार रूप में ही नहीं, बल्कि जानवरों के रूप में भी हमें यह कहानियाँ आदर्श देती हैं। इन जातक कथाओं के ही माध्यम से हम मनुष्य की पशुता और मनुष्य की मनुष्यता को बड़ी ही आसानी से सहज भाषा में समझ सकते हैं। उन्होंने कहा की बुद्ध असल में संज्ञा नहीं है,बल्कि विशेषण है। सत्यदेव ने कई कहानियों और किस्से भी साझा किये और उन किस्सों की सिखों एवं आदर्शों की प्रासंगिकता की गहराई से चर्चा की।    
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दूसरी प्रस्तुति में प्रीति झा तिवारी के निर्देशन में स्वर्ण हंस जातक पर आधारित नाटक बुद्धायन का मंचन हुआ। इस नाटक में दो जातक कथाओं को नाटक के माध्यम से क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया। पहली कथा में  तथागत बुद्ध के आदर्शों पर चलने वाले एक योगी द्वारा उस महिला की रक्षा करना है, जिसे गाँव की नदी से पानी भरने नहीं दिया जाता एवं उसके बदले उसे प्रताड़ित किया जाता है।

योगी सही वक्त पर आकर प्रताड़ना देने वाले राजा और उसके सहयोगिओं को बुद्ध का उपदेश देकर उनकी आँखें खोलने का काम करते हैं। यही योगी प्रसव के बाद भूख से व्याकुल एक शेरनी के भोजन के लिए अपनी देह का त्याग कर देते हैं। इसी क्रम में दूसरी कथा बनारस के घाट पर पूजापाठ एवं अन्य अनुष्ठानिक कर्म करने वाले ब्राह्मण की है, जिसका बड़ा परिवार है तथा उनका पोषण करने में उसे अनेक कष्टों का सामना करना पड़ता है। 
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ऐसे ही एक दिन जब उसकी मृत्यु हो जाती है और बाद में वह स्वर्ण हंस के रूप में जन्म लेता है, तब एक दिन उसकी इच्छा अपने परिवार का हाल जानने की होती है। वह उड़कर अपने घर जाता है और गरीबी तथा दयनीय हालत में दिन काट रहे बच्चों और पत्नी को देखकर व्यथित हो जाता है। यह दुःख जब असहनीय हो जाता है तो वह अपने परिवार को अपना परिचित करा देता है और अपना एक सोने का पंख निकालकर पत्नी को देकर अपनी स्थिति को ठीक करने के लिए कहता है। 
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लेकिन समृध्दि पाते-पाते परिवार में इतना लालच आ जाता है कि वो स्वर्ण हंस से प्रतिदिन एक पंख,उसके पश्चात् दो पंख प्राप्त करने की अपेक्षा करते हैं। लालच जब चरम पर पहुँचता है तो उसकी पत्नी और बच्चे मिलकर उसके सारे पंख ही उखाड़ देने का हिंसक कार्य करते हैं।
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इस नाटक में मंच पर शुभांकर दीक्षित, राहुल शर्मा, कशफ़ खान, कमलेश दुबे, रश्मि आचार्य, संदीप पाटिल, राजश्री ठक्कर, जली प्रिया, अपूर्व मिश्रा, सुमित प्रकाश पाण्डेय, रचित सक्सेना, शिवम् कसेरा और शुभम देशमुख ने अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कोरस पर देवेश दुबे,रचित सक्सेना, प्रभात महरा, पर्व साहू, शिवम् कसेरा, शुभम देशमुख और रजनीश परमार ने साथ दिया। मंच व्यवस्था में कमलेश दुबे ने, मंच परिकल्पना में प्रमोद गायकवाड़ ने, वेशभूषा में रश्मि आचार्य और प्रमोद गायकवाड़ ने, कोरियोग्राफी हर्ष दौण्ड ने, मंच सामग्री में रचित सक्सेना ने, रूपसज्जा में सराफत अली ने, संगीत परिकल्पना में गगन सिंह बैस ने, संगीत निर्देशन में विकास सिर्मोलिया ने, रिकॉर्ड म्यूजिक में मॉरिस लाजरस ने, प्रकाश परिकल्पना में तानाजी ने सहयोग किया। इस नाटक का निर्देशन प्रीति झा तिवारी ने किया।          

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