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भाषा और भाव ही रंगकर्मी की कला है

युवा रंगकर्मियों ने जाने मैनेजमेंट के गुर
मोटिवेशनल स्पीकर महेंद्र जोशी ने दिए टिप्स
वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश दवे का किया सम्मान
उज्जैन.किसी ने सही ही कहा है,कि विश्व एक मंच हैं और यहां रहने वाले सभी लोग नाटक के पात्र। रंगमंच समाज का दर्पण हैं जिसे कलकार अभिनय कर प्रस्तुत करते हैं। समय गुजरता गया तो रंगमंच की स्थिति में कई बदलाव देखने को मिले। लेकिन आज भी रंगमंच जीवित है। 
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रंगमंच की इस दुनिया में रंगकर्मी को किस तरह अपने जीवन को मैनेज करना चाहिए,यह बात स्पर्श वेलफेयर सोसायटी द्वारा आयोजित उड़ान 2018 कार्यक्रम में मोटिवेशनल स्पीकर महेंद्र जोशी ने रंगकर्मियों से कही। आपने बताया कि युवा कलाकारों को सेल्फ़ ऑडिट करना चाहिए। उद्देश्य तय कर कार्य करना ही एक सफल रंगकर्मी की पहचान है। रंगमंच को अगर अपना जीवन देने का संकल्प किया है, तो हिंदी,अंग्रेजी तथा संस्कृत भाषा में पकड़ करना जरुरी है। भाषा ही एक रंगकर्मी को श्रोताओं से जोड़ती है। वहीं दुसरी ओर भाषा के साथ भाव भी जुड़ा होता है। रंगकर्मी मंच से भाषा को माध्यम बनाकर भाव प्रस्तुत कर मंचन करता है,और यहीं कला उस रंगकर्मी को श्रोताओं से जोड़ती है। 
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कार्यक्रम के अगले चरण मे वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश दवे ने संस्था द्वारा किए जा रहे कार्यों की सराहना की। वहीं कार्यक्रम में उपस्थित युवाओं कलाकारों को जोशी द्वारा दिए गए सुझावों को अपने दैनिक जीवन में अमल करने की सलाह दी।परियोजना निदेशक नीरज थोरात ने बताया कि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि वरिष्ठ रंगकर्मी सतीश दवे एवं भोपाल से पधारे मोटिवेशनल स्पीकर महेंद्र जोशी थे। कार्यक्रम में वरिष्ठ मार्गदर्शक सूर्यकांत थोरात,संस्था अध्यक्ष श्रीमती अर्पिता मिश्रा, परियोजना अधिकारी अध्यान्त पाटिल, समीर मिश्रा विशेष रूप से उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन परियोजना निदेशक नीरज थोरात ने किया। 

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