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कथकली शैली में कीचक वध की प्रभावशाली प्रस्तुति का हुआ मंचन

तीन दिवसीय यक्षकथी समारोह का हुआ शुभारंभ
महाभारतकालीन समय की एक उपकथा को किया रेखांकित
वनवास पूरा करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती
भोपाल. जनजातीय संग्रहालय के ऑडिटोरियम में आज से तीन दिवसीय यक्षकथी समारोह का आयोजन शुरू हुआ। समारोह के पहले दिन कथकली शैली में कीचक वधम् प्रसंग का मंचन किया गया। लगभग दो घण्टे की यह प्रस्तुति महाभारतकालीन समय की एक उपकथा को रेखांकित करती है।
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इराइमन थम्पी ने लगभग 1782 से 1856 ईस्वी के कालखण्ड में इस प्रसंग को मंच के लिए तैयार किया था। जिस समय पाण्डवों को वनवास होता है वे पत्नी द्रौपदी के साथ जंगलों में भटक रहे होते हैं। वनवास पूरा करने के बाद सबसे बड़ी चुनौती एक वर्ष का अज्ञातवास होता है जिसमें उनको पहचान बदलकर रहना होता है। तेरह वर्ष के इस कालखण्ड में यह प्रसंग घटित होता है जब पाण्डव भाई भीम को बलशाली कीचक से युद्ध करना होता है।
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इस पूरे प्रसंग को सात दृश्यों में विभाजित कर एक के बाद एक प्रस्तुत किया गया। आपको बता दे कि प्रस्तुति के लिए लम्बे और धैर्यसाध्य रूप श्रृंगार के लिए कलाकार कार्यक्रम स्थल पर छः घण्टे पहले ही आ गए थे। कथकली कलाकारों के लिए मेकअप और प्रस्तुति एक प्रकार का अनुष्ठानिक वृत होती है। बड़े समर्पण भाव के साथ मंच पर प्रस्तुति देखने में आई। पात्रों का नृत्य कौशल, भावाभिनय और विशेष रूप नेत्र संचालन अत्यन्त प्रभावी थे।
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गुरु कलामण्डलम बालासुब्रमण्यम के मार्गदर्शन में प्रस्तुत कीचक वधम् में कीचक की भूमिका उन्हीं ने निभाई थी,जबकि सैरन्ध्री बनी द्रौपदी की भूमिका में कलामण्डलम शिवदासन थे। वलाला भीम की भूमिका में मंच पर कलामण्डलम गोपालकृष्णन और कीचक का संघर्ष, युद्ध समृद्ध कलावैभव के साथ ही रोमांचकारी प्रभाव के साथ प्रस्तुत हुआ।
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संगीत पक्ष में गायन सदानम शिवदासन और कलामण्डलम स्रिजीथ, चण्डा वादन कलानिलयम रथीश, मदलम वादन कलामण्डलम वैशाख ने अभिनेय प्रस्तुति के वातावरण प्रभाव को निर्मित करने में सधा हुआ योगदान किया। यह प्रस्तुति कथकली स्कूल, चेरुथुरुथी केरला की थी। समारोह के दूसरे दिन 19 जून को चिण्डू भागवतम शैली में रावण के शिव तप पर एकाग्र भूकैलाश प्रसंग की प्रस्तुति शाम साढ़े सात बजे से होगी। यह तेलंगाना प्रदेश के सुदूर अंचल की अत्यन्त दुर्लभ लेकिन लगभग पाँच सौ वर्ष पुरानी पारम्परिक शैली है। समारोह में प्रवेश निशुल्क है।

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